Wednesday, 24 February 2021

हिन्दू कौन है

 हिन्दू कौन है, क्या आप जानते है, नहीं जानते हैं तो पढ़ें...

---------------------------------------------------------------------------


"हिन्दू" शब्द की खोज -

"हीनं दुष्यति इति हिन्दूः से हुई है।”


अर्थात जो अज्ञानता और हीनता का त्याग करे उसे हिन्दू कहते हैं।


'हिन्दू' शब्द, करोड़ों वर्ष प्राचीन, संस्कृत शब्द से है!


यदि संस्कृत के इस शब्द का सन्धि विछेदन करें तो पायेंगे ....


हीन+दू = हीन भावना + से दूर


अर्थात जो हीन भावना या दुर्भावना से दूर रहे, मुक्त रहे, वो हिन्दू है !


हमें बार-बार, सदा झूठ ही बतलाया जाता है कि हिन्दू शब्द मुगलों ने हमें दिया, जो "सिंधु" से "हिन्दू" हुआ l


हिन्दू शब्द की वेद से ही उत्पत्ति है !


जानिए, कहाँ से आया हिन्दू शब्द, और कैसे हुई इसकी उत्पत्ति ?


कुछ लोग यह कहते हैं कि हिन्दू शब्द सिंधु से बना है औऱ यह फारसी शब्द है। परंतु ऐसा कुछ नहीं है!

ये केवल झुठ फ़ैलाया जाता है।


हमारे "वेदों" और "पुराणों" में हिन्दू शब्द का उल्लेख मिलता है। आज हम आपको बता रहे हैं कि हमें हिन्दू शब्द कहाँ से मिला है!


"ऋग्वेद" के "ब्रहस्पति अग्यम" में हिन्दू शब्द का उल्लेख इस प्रकार आया हैं :-


“हिमलयं समारभ्य

यावत इन्दुसरोवरं ।

तं देवनिर्मितं देशं

हिन्दुस्थानं प्रचक्षते।"


अर्थात : हिमालय से इंदु सरोवर तक, देव निर्मित देश को हिंदुस्तान कहते हैं!


केवल "वेद" ही नहीं, बल्कि "शैव" ग्रन्थ में हिन्दू शब्द का उल्लेख इस प्रकार किया गया हैं:-


"हीनं च दूष्यतेव् हिन्दुरित्युच्च ते प्रिये।”


अर्थात :- जो अज्ञानता और हीनता का त्याग करे उसे हिन्दू कहते हैं!


इससे मिलता जुलता लगभग यही श्लोक "कल्पद्रुम" में भी दोहराया गया है :


"हीनं दुष्यति इति हिन्दूः।”


अर्थात जो अज्ञानता और हीनता का त्याग करे उसे हिन्दू कहते हैं।


"पारिजात हरण" में हिन्दू को कुछ इस प्रकार कहा गया है :-


”हिनस्ति तपसा पापां

दैहिकां दुष्टं ।

हेतिभिः श्त्रुवर्गं च

स हिन्दुर्भिधियते।”


अर्थात :- जो अपने तप से शत्रुओं का, दुष्टों का, और पाप का नाश कर देता है, वही हिन्दू है !


"माधव दिग्विजय" में भी हिन्दू शब्द को कुछ इस प्रकार उल्लेखित किया गया है :-


“ओंकारमन्त्रमूलाढ्य

पुनर्जन्म द्रढ़ाश्य:।

गौभक्तो भारत:

गरुर्हिन्दुर्हिंसन दूषकः।


अर्थात : वो जो "ओमकार" को ईश्वरीय धुन माने, कर्मों पर विश्वास करे, गौपालक रहे, तथा बुराइयों को दूर रखे, वो हिन्दू है!


केवल इतना ही नहीं, हमारे "ऋगवेद" (८:२:४१) में विवहिन्दू नाम के बहुत ही पराक्रमी और दानी राजा का वर्णन मिलता है, जिन्होंने 46,000 गौमाता दान में दी थी! और "ऋग्वेद मंडल" में भी उनका वर्णन मिलता है l


बुराइयों को दूर करने के लिए सतत प्रयासरत रहनेवाले, सनातन धर्म के पोषक व पालन करने वाले हिन्दू हैं।


"हिनस्तु दुरिताम

Friday, 5 February 2021

क्या 'एक मौत' गृहयुद्ध करवा सकती है

 क्या 'एक मौत' गृहयुद्ध करवा सकती है, सरकारें बदल सकती है???


* पोस्ट थोड़ी लंबी है, इत्मीनान से पढियेगा


26 जनवरी को एक कथित किसान नवनीत सिंह की मौत हो गयी। मीडिया ने हल्ला मचाया कि पुलिस ने गोली मार दी, लेकिन CCTV फुटेज से पता लगा कि नवनीत साहब तो स्टंट कर रहे थे, तेजी से ट्रेक्टर चला कर बैरिकेड्स पर चढ़ा दिया, जिससे ट्रेक्टर पलटा और उसकी मौत हो गई।


लेकिन इस एक अदद हिस्से में आई मौत को विपक्ष और मीडिया, येन केन प्रकारेण.....पुलिस के अत्याचार से जोड़ने में लगी रही। फिर चाहे वो The Wire की फर्जी स्टोरी हो, जिसमे एक डॉक्टर ने कथित रूप से कहा कि 'our hands are tied' , मतलब सरकार ने दबाव बना रखा है.....कुल मिलाकर ये दिखाया जा रहा था कि मौत गोली मारने से ही हुई है। बाद में रामपुर के CMO ने बाकायदा बयान दिया और स्टेटमेंट जारी किया कि मौत एक्सीडेंट से ही हुई, शरीर से कोई गोली नही मिली।


लेकिन गिद्धों ने तो आतंक मचा दिया, सोशल मीडिया पर पोस्ट्स, Wire के आर्टिकल्स घूम रहे थे। फिर FIR हुई और अब सरकार एक्शन लेगी और कथित 'सेक्युलर-लिबरल' गैंग का रोना धोना शुरू हो जाएगा।


यहां सवाल ये है, कि इस एक्सीडेंट से हुई मौत को क्यों पुलिस द्वारा गोली मारने पर जोर दिया जा रहा है? क्या इस मौत से माहौल बदल सकता है? क्या इससे गृहयुद्ध छिड़ सकता है? क्या सरकार जा सकती है?


इन सबके उत्तर हैं......हाँ


चलिए आपको एक कहानी सुनाते हैं.....शायद तब समझ आये कि आखिर चल क्या रहा है आपके आस पास 


इस कहानी की शुरुआत होती है 17 दिसंबर 2010 को, जिस दिन ट्यूनीशिया के एक आम नागरिक मुहम्मद बुज़ीजी ने अपने आपको आग लगा ली थी। वो काफी हद तक जल गए थे, और 4 जनवरी 2011 को उनकी मौत हो गयी।


आग क्यों लगाई??

मुहम्मद बुजीजी एक आम नागरिक थे, नौकरी चली गयी, काम धंधा मिला नही, इसलिए एक सब्जियों की दुकान लगा ली। नगरपालिका वाले आये और रिश्वत मांगने लगे, नही देने पर उनका सारा सामान उठा कर ले गए। इस घटना से दुखी हो कर उन्होंने आग लगा ली, और बाद में उनकी मृत्यु हो गयी।


अब थोड़ा फ्लैशबैक में चलते हैं....मिडिल ईस्ट और अफ्रीका के जितने भी इस्लामिक देश हैं, कुछ एक को छोड़ कर सभी मे तानाशाही/राजशाही थी या फिर किसी एक ही शासक का राज चल रहा था। लोग वहां के शासन से परेशान थे। कानून व्यवस्था ठीक थी, लेकिन कामगारों के कानून और नौकरियों को लेकर काफी समस्याएं थी।


इजिप्ट हो, अल्जीरिया हो, ट्यूनीशिया हो, वेस्टर्न सहारा इलाका हो, यमन हो, जॉर्डन हो...इन सभी देशों में कहीं ना कहीं सत्ता विरोध पनप रहा था। इसके पीछे मुख्य कारण गरीबी, नौकरियों की कम संख्या, हड़ताल, लंबे समय से सत्ता का 'एक' ही हाथ मे होना था।


इन सभी देशों में 2004 से ही छोटे मोटे प्रदर्शन होते रहे, लेकिन सरकारें सुरक्षित थी। छोटे मोटे उपद्रव होते रहे....लेकिन ऊपर की सतह पर सब शांत ही दिखता था।


2009-2010 में स्थिति बदली....सोशल मीडिया पैर जमा चुका था...भारत मे लोग तब ट्विटर से अनजान थे, और फेसबुक को दोस्तो से जुड़ने का एक माध्यम मात्र माना जाता था। लेकिन मिडिल ईस्ट में यही सोशल मीडिया अगले 1-2 साल में एक बहुत बड़ी सुनामी लाने वाला था।


अब वापस आते हैं बुजीजी कि मौत पर। जिस दिन बुजीजी ने अपने आपको आग लगाई, ट्यूनिशिया में एकाएक बवाल शुरू हो गया। ऐसा लगा कि शायद जिस घटना का इंतज़ार था, वो घट गई है। पूरे ट्यूनिशिया में जबरदस्त सत्ता विरोध होने लगा। देखादेखी आस पास के देशों में भी उपद्रव शुरू हो गए।


4 जनवरी 2011 को बुजीजी की मौत हुई, और पिछले 19 दिनों से 'एक मौत' के इंतज़ार में बैठे गिद्ध अब काम मे लग गए। सोशल मीडिया का जम कर इस्तेमाल हुआ। ढेरो ट्वीट्स, पोस्ट्स, फोटो, वीडियो शेयर होना शुरू हुए। उंस समय तो Fake News का कांसेप्ट भी लोगो को समझ नही आता था.....लेकिन गिद्धों को इस सोशल मीडिया की ताकत का पता था। कुछ ही घंटों में पूरे मिडिल ईस्ट और अफ्रीका में लाखों वीडियो और पोस्ट, जिनमे सरकारी अत्याचार दिखाया जा रहा था (सच और झूठ) हर इंसान के फ़ोन में पहुँचा दिए गए।और उसके बाद जो हुआ, उसकी कल्पना भी नही की थी किसी ने।


अरब स्प्रिंग - Arab Awakening 

जनवरी 2011 से दिसंबर 2012 तक, मिडिल ईस्ट ,अरब और अफ्रीका के देशों ने एक अचंभित करने वाला कृत्य देखा और महसूस किया। बुजीजी की मौत ने पिछले 5-7 साल से चले आ रहे गुस्से को नफरत के विस्फोट में बदल दिया, और ये पूरा रीजन एक भयावह स्थिति में पड़ गया।


इजिप्ट, सीरिया, ट्यूनिशिया, यमन, लीबिया, बहरीन, कुवैत, सूडान, सऊदी अरब, मोरक्को, इराक़ जैसे कई देश इस आग की चपेट में आ गए। सत्ता विरोध शुरू हुआ और इसका अगला प्रतीक बना इजिप्ट का 'तहरीर चौक' जिसे Tahrir Square कहा जाता है। लाखो लोगो ने एक sqaure पर इकट्ठे हो कर धरना दिया और सरकारों को झुकने पर मजबूर कर दिया।


तौर तरीके जो इस्तेमाल किये गए

इस पूरे घटनाक्रम में पुराने तरीको के अलावा कुछ नए और अनजाने तरीके भी इस्तेमाल किये गए। 


नीचे कुछ शब्द दे रहा हूँ, इन्हें कृपया अपनी डिक्शनरी में ढूँढिये,पढिये और समझिए। भारत मे भी अब आपको ये शब्द आसानी से सुनने को मिल रहे हैं, मिलते रहेंगे।


Political activism, Civil Disobedience, Civil Unrest, Protest, Defection, Insurgency, Media Activism, Social Media Activism, Riots, Self Immolation, Mutiny, Defection, Internet Activism, Urban Warfare, Silent Protests, Silent Uprising, Revolution and last but not the least 'Huriya'...that means आज़ादी।


रातों रात सैकड़ो फेसबुक पेज बने, हजारो ट्विटर हैंडल बनाये गए। लोगो को mobilize करने का काम शुरू हुआ। लोगो को इकट्ठा करना अब काफी आसान था, फिर चाहे शांतिपूर्ण प्रोटेस्ट्स हो, पत्थरबाजी करनी हो...ये सब अब एक ट्वीट या एक फेसबुक पोस्ट से संभव था। सरकार विरोधी ब्लॉग्स और वेबसाइट की बाढ़ आ गयी, आज़ादी और ह्यूमन राइट्स के किस्से कहानी सुना कर लोगो को भड़काना शुरू किया गया। ट्यूनिशिया में एक सर्वे किया गया था, जिसमे 90% लोगो ने कहा कि इस uprising में उनका मुख्य टूल था सोशल मीडिया। सोशल मीडिया को रोकना आसान नही था, क्योंकि तब तक इसके प्रभाव के बारे में सत्ता में रहने वाले लोगो को अंदेशा ही नही था। सत्ता केवल मीडिया पर रोक लगा सकती है, यहां तो स्मार्टफोन रखने वाला हर इंसान एक पत्रकार की भूमिका निभा सकता था। 


अरब स्प्रिंग से हासिल क्या हुआ?

लोगो को भड़काया गया, उन्हें ये दिखाया गया कि तुम्हारी जिंदगी बर्बाद है, आइये इस गुलामी से, इस गुरबत की ज़िंदगी से आज़ादी लेते हैं। सोशल मीडिया और मेनस्ट्रीम मीडिया द्वारा लोगो को भड़काया गया। मोहम्मद बुजीजी की मौत, उसके जलने के दृश्य, अस्पताल में उसकी तस्वीरों से हर स्मार्टफोन को भर दिया गया। जाहिर है, जब आपको एक ही तरह का कंटेंट मिलेगा, तो भड़कना लाजिमी है। और आप किसी को भी कहें कि आपकी जिंदगी में में दुख है, कमी है, आप पर अत्याचार हो रहा है....तो 99.9% लोग किसी न किसी रूप में सहमति जता ही देंगे। लोग अमूमन अपनी जिंदगी से खुश नही हैं।


अरब स्प्रिंग की वजह से कई देशों में सत्ता पलट गई। ट्यूनिशिया, लीबिया, यमन, इजिप्ट जैसे देशो में बड़े ही हिंसक तरीके से सत्ता बदली गयी। लीबिया के तानाशाह गद्दाफी को लोगो ने अपने हाथों से मार दिया। सीरिया में असद के खिलाफ Civil war शुरू हो गया। अरब, कुवैत, बहरीन जैसे देशों ने इस अरब स्प्रिंग को ताकत से कुचल दिया। मोरक्को, जॉर्डन और फिलिस्तीन में वहां के सत्ताधीशों ने जरूरी बदलाव किए और जान बचाई। 


कुल मिलाकर 61,000 लोगो की अपनी जान गंवानी पड़ी। सीरिया में सिविल वॉर की वजह से ISIS का उद्भव हुआ और वो धीरे धीरे सिरिया से होते हुए इराक़ और अन्य इलाकों तक पहुच गया। उसके द्वारा हुई कत्ल ए आम को जोड़ दें, तो ये संख्या लाखो में पहुचेगी।


गिद्धों ने जनता को एक छद्म लोकतंत्र और आज़ादी का लॉलीपॉप दिया, जनता मासूम थी और पड़ गयी इस चक्कर मे। सत्ता भी गयी, देश भी जल गया.....आज तक ये देश संभल नही पाए हैं। कोई भी चाहे तो इन देशों की इकनोमिक, न्याय व्यवस्था, आम नागरिक के जीवन स्तर, काम धंधे, आम जनजीवन के स्तर के बारे में तथ्यात्मक आंकलन करे, तो ये पता लगेगा कि 2010 से पहले और 2010 के बाद इन सभी इंडीकेटर्स में जबरदस्त गिरावट आई है।


तो सवाल है कि आखिर मिला क्या? उत्तर है 'कुछ नही'


अब घूम फिर कर भारत पर आते हैं। किसानों का आंदोलन चल रहा है.....उससे पहले दलितों का आंदोलन चला, CAA के नाम पर मुसलमानों का आंदोलन चला, कभी जाट आंदोलन चलता है, कभी गुज्जर आंदोलन चलता है। ये सब हमारी 'Fault Lines' हैं...जैसे जमीन के अंदर fault lines होती हैं...उनके हिलने डुलने से भूकंप आता है.....वैसे ही ये सब हमारे देश की फाल्ट लाइन्स है। समय समय पर इनकी testing होती है। इस बार माहौल एकदम गर्म था। खालिस्तानियों द्वारा इसको हवा दी गयी, मासूम किसानो को भड़का कर दिल्ली के मुहाने पर लाया गया। 2 महीने की घेराबंदी के बाद 26 जनवरी को चुना गया Action Day के लिए।


वो हर कोशिश की गई, जिससे पुलिस या सरकार को भड़काया जाए। वो हर काम किया गया जिससे किसी का भी खूब उबाल मारे और बदले में हाथ उठा दिया जाए। लेकिन एक गोली नही चली, एक भी जान नही गयी।


क्या होता अगर एक भी मौत होती?

लाल किला 'तहरीर स्क्वायर' में बदल जाता.....सोशल मीडिया, मीडिया और अंतरराष्ट्रीय घेराबंदी होती, देश भर में दंगे होते, सरकार को किसान विरोधी और सिख विरोधी बताया जाता....और emotional stories से मीडिया को पाट दिया जाता। उसमे हम आप जैसे 'भक्त' भी फंस जाते। और फिर शुरू होता India Spring या Indian Uprising..... जिसका परिणाम होता भारत मे लोकतंत्र का खात्मा। ये गिद्ध वो सब काम कर रहे थे जो arab spring के समय किये गए। आप ऊपर जा कर पढिये, और अरब की जगह भारत सोचिए....क्या ये सब अब भारत मे नही किया जा रहा?


आज गिद्ध परेशान हैं, जान बूझकर एक एक्सीडेंट की मौत को सत्ता द्वारा की गई हत्या साबित नही कर पा रहे। इन्हें दुख है कि नवनीत सिंह को मुहम्मद बुजीजी नही बनाया जा सके। इन्हें दुख है कि लाल किले तक इनके लोग पहुच गए, फिर भी सरकार ने एक भी गोली क्यों नही चलाई। इन्हें दुख है कि हजारो करोड़ की फंडिंग फूंकने के बाद भी इनके हाथ कुछ नही लगा।


चलिए गिद्धों के तो दुख है.....लेकिन आम जनता का क्या.....क्या आपको पता भी है कि पर्दे के पीछे खेल क्या चलते हैं? पैटर्न्स समझना सीखिए, घटनाओं को सही context में देखना सीखिए.....चीजें जो होती हैं, अमूमन वैसी दिखती नही। कभी कभी Inaction ही सबसे बड़ा Action होता है.....think strategically......else you will be doomed very soon......Vultures are here to stay for long...buckle up and brace for more such attacks....all they need is 1 bloody dead body.

Saturday, 30 January 2021

राम मनोहर लोहिया

 






राम मनोहर लोहिया

जन्म: 23 मार्च, 1910, अकबरपुर, फैजाबाद

 

निधन: 12 अक्टूबर, 1967, नई दिल्ली

 

कार्य क्षेत्र: स्वतंत्रता सेनानी, राजनेता

 

राम मनोहर लोहिया एक स्वतंत्रता सेनानी, प्रखर समाजवादी और सम्मानित राजनीतिज्ञ थे. राम मनोहर ने हमेशा सत्य का अनुकरण किया और आजादी की लड़ाई में अद्भुत काम किया. भारत की राजनीति में स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान और उसके बाद ऐसे कई नेता आये जिन्होंने अपने दम पर राजनीति का रुख़ बदल दिया उन्ही नेताओं में एक थे राममनोहर लोहिया। वे अपनी प्रखर देशभक्ति और तेजस्‍वी समाजवादी विचारों के लिए जाने गए और इन्ही गुडों के कारण अपने समर्थकों के साथ-साथ उन्होंने अपने विरोधियों से भी बहुत सम्‍मान हासिल किया।

 

बचपन और प्रारंभिक जीवन

 

राम मनोहर लोहिया का जन्म 23 मार्च, 1910 को उत्तर प्रदेश के अकबरपुर में हुआ था. उनकी मां एक शिक्षिका थीं. जब वे बहुत छोटे थे तभी उनकी मां का निधन हो गया था. अपने पिता से जो एक राष्ट्रभक्त थे, उन्हें युवा अवस्था में ही विभिन्न रैलियों और विरोध सभाओं के माध्यम से भारत के स्वतंत्रता आंदोलनों में भाग लेने की प्रेरणा मिली. उनके जीवन में नया मोड़ तब आया, जब एक बार उनके पिता, जो महात्मा गांधी के घनिष्ठ अनुयायी थे, गांधी से मिलाने के लिए राम मनोहर को अपने साथ लेकर गए. राम मनोहर गांधी के व्यक्तित्व और सोच से बहुत प्रेरित हुए तथा जीवनपर्यन्त गाँधी जी के आदर्शों का समर्थन किया.

 

वर्ष 1921 में वे पंडित जवाहर लाल नेहरू से पहली बार मिले और कुछ वर्षों तक उनकी देखरेख में कार्य करते रहे. लेकिन बाद में उन दोनों के बीच विभिन्न मुद्दों और राजनीतिक सिद्धांतों को लेकर टकराव हो गया. 18 साल की उम्र में वर्ष 1928 में युवा लोहिया ने ब्रिटिश सरकार द्वारा गठित साइमन कमीशन का विरोध करने के लिए प्रदर्शन का आयोजन किया.

 

उन्होंने अपनी मैट्रिक परीक्षा प्रथम श्रेणी में पास करने के बाद इंटरमीडिएट में दाखिला बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में कराया. उसके बाद उन्होंने वर्ष 1929 में कलकत्ता विश्वविद्यालय से अपनी स्नातक की पढ़ाई पूरी की और पीएच.डी. करने के लिए बर्लिन विश्वविद्यालय, जर्मनी, चले गए, जहाँ से उन्होंने वर्ष 1932 में इसे पूरा किया. वहां उन्होंने शीघ्र ही जर्मन भाषा सीख लिया और उनको उत्कृष्ट शैक्षणिक प्रदर्शन के लिए वित्तीय सहायता भी मिली.

 

राम मनोहर लोहिया की विचारधारा

 

लोहिया ने हमेशा भारत की आधिकारिक भाषा के रूप में अंग्रेजी से अधिक हिंदी को प्राथमिकता दी. उनका विश्वाश था कि अंग्रेजी शिक्षित और अशिक्षित जनता के बीच दूरी पैदा करती है. वे कहते थे कि हिन्दी के उपयोग से एकता की भावना और नए राष्ट्र के निर्माण से सम्बन्धित विचारों को बढ़ावा मिलेगा. वे जात-पात के घोर विरोधी थे. उन्होंने जाति व्यवस्था के विरोध में सुझाव दिया कि “रोटी और बेटी” के माध्यम से इसे समाप्त किया जा सकता है. वे कहते थे कि सभी जाति के लोग एक साथ मिल-जुलकर खाना खाएं और उच्च वर्ग के लोग निम्न जाति की लड़कियों से अपने बच्चों की शादी करें. इसी प्रकार उन्होंने अपने यूनाइटेड सोशलिस्ट पार्टी में उच्च पदों के लिए हुए चुनाव के टिकट निम्न जाति के उम्मीदवारों को दिया और उन्हें प्रोत्साहन भी दिया. वे ये भी चाहते थे कि बेहतर सरकारी स्कूलों की स्थापना हो, जो सभी को शिक्षा के समान अवसर प्रदान कर सकें.

 

भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में योगदान

 

स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लेने की उनकी बचपन से ही प्रबल इच्छा थी जो बड़े होने पर भी खत्म नहीं हुई। जब वे यूरोप में थे तो उन्होंने वहां एक क्लब बनाया जिसका नाम असोसिएशन ऑफ़ यूरोपियन इंडियंस रखा. जिसका उद्देश्य यूरोपीय भारतीयों के अंदर भारतीय राष्ट्रवाद के प्रति जागरूकता पैदा करना था. उन्होंने जिनेवा में लीग ऑफ नेशन्स की सभा में भी भाग लिया, यद्यपि भारत का प्रतिनिधित्व ब्रिटिश राज्य के एक सहयोगी के रूप में बीकानेर के महाराजा द्वारा किया गया था, परन्तु लोहिया इसके अपवाद थे. उन्होंने दर्शक गैलरी से विरोध प्रदर्शन शुरू किया और बाद में अपने विरोध के कारणों को स्पष्ट करने के लिए उन्होंने समाचार-पत्र और पत्रिकाओं के संपादकों को कई पत्र लिखे. इस पूरी घटना ने रातों-रात राम मनोहर लोहिया को भारत में एक सुपर स्टार बना दिया। भारत वापस आने पर वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस पार्टी में शामिल हो गए और वर्ष 1934 में कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी की आधारशिला रखी. वर्ष 1936 में पंडित जवाहर लाल नेहरू ने उन्हें अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी का पहला सचिव नियुक्त किया.

 

24 मई, 1939 को लोहिया को उत्तेजक बयान देने और देशवासियों से सरकारी संस्थाओं का बहिष्कार करने के लिए लिए पहली बार गिरफ्तार किया गया, पर युवाओं के विद्रोह के डर से उन्हें अगले ही दिन रिहा कर दिया गया. हालांकि जून 1940 में उन्हें “सत्याग्रह नाउ” नामक लेख लिखने के आरोप में पुनः गिरफ्तार किया गया और दो वर्षों के लिए कारावास भेज दिया गया. बाद में उन्हें दिसम्बर 1941 में आज़ाद कर दिया गया. भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान वर्ष 1942 में महात्मा गांधी, नेहरू, मौलाना आजाद और वल्लभभाई पटेल जैसे कई शीर्ष नेताओं के साथ उन्हें भी कैद कर लिया गया था.

 

इसके बाद भी वे दो बार जेल गए, एक बार उन्हें मुंबई में गिरफ्तार कर लाहौर जेल भेजा गया था और दूसरी बार पुर्तगाली सरकार के खिलाफ भाषण और सभा करने के आरोप में गोवा. जब भारत स्वतंत्र होने के करीब था तो उन्होंने दृढ़ता से अपने लेखों और भाषणों के माध्यम से देश के विभाजन का विरोध किया था. वे देश का विभाजन हिंसा से करने के खिलाफ थे. आजादी के दिन जब सभी नेता 15 अगस्त, 1947 को दिल्ली में इकट्ठे हुए थे, उस समय वे भारत के अवांछित विभाजन के प्रभाव के शोक की वजह से अपने गुरु (महात्मा गाँधी) के साथ दिल्ली से बाहर थे.

 

स्वतंत्रता के बाद की गतिविधियाँ

 

आजादी के बाद भी वे राष्ट्र के पुनर्निर्माण के लिए एक स्वतंत्रता सेनानी के रूप में ही अपना योगदान देते रहे. उन्होंने आम जनता और निजी भागीदारों से अपील की कि वे कुओं, नहरों और सड़कों का निर्माण कर राष्ट्र के पुनर्निर्माण के लिए योगदान में भाग लें. तीन आना, पन्द्रह आना के माध्यम से राम मनोहर लोहिया ने प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू पर होने वाले खर्च की राशि “एक दिन में 25000 रुपए” के खिलाफ आवाज उठाई जो आज भी चर्चित है. उस समय भारत की अधिकांश जनता की एक दिन की आमदनी मात्र 3 आना थी जबकि भारत के योजना आयोग के आंकड़े के अनुसार प्रति व्यक्ति औसत आय 15 पन्द्रह आना था.

 

लोहिया ने उन मुद्दों को उठाया जो लंबे समय से राष्ट्र की सफलता में बाधा उत्पन्न कर रहे थे. उन्होंने अपने भाषण और लेखन के माध्यम से जागरूकता पैदा करने, अमीर-गरीब की खाई, जातिगत असमानताओं और स्त्री-पुरुष असमानताओं को दूर करने का प्रयास किया. उन्होंने कृषि से सम्बंधित समस्याओं के आपसी निपटारे के लिए हिन्द किसान पंचायत का गठन किया। वे सरकार की केंद्रीकृत योजनों को जनता के हाथों में देकर अधिक शक्ति प्रदान करने के पक्षधर थे. अपने अंतिम कुछ वर्षों के दौरान उन्होंने देश की युवा पीढ़ी के साथ राजनीति, भारतीय साहित्य और कला जैसे विषयों पर चर्चा किया.

 

निधन

 

राम मनोहर लोहिया का निधन 57 साल की उम्र में 12 अक्टूबर, 1967 को नई दिल्ली में हो गया.

 

शान्ति स्वरूप भटनागर

 







शान्ति स्वरूप भटनागर

शान्ति स्वरूप भटनागर (अंग्रेज़ी: Shanti Swaroop Bhatnagar, जन्म: 21 फ़रवरी, 1894, शाहपुर, पाकिस्तान; मृत्यु: 1 जनवरी, 1955) प्रसिद्ध भारतीय वैज्ञानिक, जो औद्योगिक अनुसन्धान परिषद के निदेशक रहे। इन्होंने राष्ट्रीय प्रयोगशालाओं की स्थापना में अमूल्य योगदान दिया।

 

जीवन परिचय :शान्ति स्वरूप भटनागर का जन्म 21 फ़रवरी, 1894 को शाहपुर (वर्तमान पाकिस्तान) में हुआ था। इनके पिता का नाम परमेश्वरी सहाय भटनागर था। इनका बचपन अपने ननिहाल में ही बीता। इनके नाना एक इंजीनियर थे, इसी कारण उनकी रुचि विज्ञान और अभियांत्रिकी में बढ़ गयी थी। इन्हें यांत्रिक खिलौने, इलेक्ट्रानिक बैटरियां और तारयुक्त टेलीफोन बनाने का शौक़ रहा। शान्ति स्वरूप भटनागर ने यूनिवर्सिटी कॉलेज, लंदन से 1921 में, विज्ञान में डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त की। भारत लौटने के बाद, उन्हें बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय से प्रोफ़ेसर के पद पर कार्य किया था।

 

पुरस्कार :शान्ति स्वरूप भटनागर को विज्ञान एवं अभियांत्रिकी क्षेत्र में सन 1954 में पद्म भूषण से सम्मानित किया गया था।

 

निधन :शान्ति स्वरूप भटनागर का निधन 1 जनवरी 1955 में हुआ था। शान्ति स्वरूप भटनागर की मृत्यु के बाद सी. एस. आई. आर. (CSIR) ने कुशल वैज्ञानिकों के लिए शान्ति स्वरूप भटनागर पुरस्कार की घोषणा की थी।

 

सरदार वल्लभ भाई पटेल

 





सरदार वल्लभ भाई पटेल

जन्म : 31 अक्टूबर, 1875

 

निधन : 15 दिसंबर, 1950

 

उपलब्धियां : ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध खेड़ा सत्याग्रह और बरडोली विद्रोह का सफलतापूर्वक नेतृत्व किया, 1922, 1924 और 1927 में अहमदाबाद नगर निगम के अध्यक्ष चुने गए, 1931 में कांग्रेस के अध्यक्ष चुने गए, स्वतंत्र भारत के प्रथम उप प्रधानमंत्री और गृह मंत्री बने, भारत के राजनैतिक एकीकरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, 1991 में भारतरत्न के लिए पुष्टि की गईभारत के प्रथम उप प्रधानमंत्री और गृह मंत्री सरदार पटेल लोकप्रिय लौह पुरुष के रूप के नाम से भी जाने जाते हैं। उनका पूरा नाम वल्लभ भाई पटेल था। उन्होंने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और भारत के प्रथम उप प्रधानमंत्री और गृहमंत्री बने। उन्हें भारत के राजनैतिक एकीकरण का श्रेय दिया जाता है।

 

प्रारंभिक जीवन :वल्लभ भाई पटेल का जन्म 31 अक्टूबर 1875 को गुजरात के एक छोटे से गाँव नाडियाड में हुआ था। उनके पिता झावेरभाई एक किसान और मां लाडबाई एक साधारण महिला थी। सरदार वल्लभ भाई की प्रारंभिक शिक्षा करमसद में हुई। फिर उन्होंने पेटलाद के एक विद्द्यालय में प्रवेश लिया। दो वर्ष के पश्चात उन्होंने नाडियाड शहर के एक हाई स्कूल में प्रवेश लिया। उन्होंने अपनी हाई स्कूल की परीक्षा 1896 में उत्तीर्ण की। सरदार वल्लभ भाई पटेल अपनी पूरी शिक्षा के दौरान एक मेधावी छात्र रहे।वल्लभ भाई वकील बनना चाहते थे और अपने इस सपने को पूरा करने के लिए उन्हें इंग्लैंड जाना था किंतु उनके पास इतने भी वित्तीय साधन नहीं थे कि वह एक भारतीय महाविद्यालय में प्रवेश ले सकें। उन दिनों एक उम्मीदवार व्यक्तिगत रूप से अध्ययन कर वकालत की परीक्षा में बैठ सकता था। अतः सरदार वल्लभ भाई पटेल ने अपने एक परिचित वकील से पुस्तकें उधार ली और घर पर अध्यन आरम्भ कर दिया। समय-समय पर उन्होंने अदालतों के कार्यवाही में भी भाग लिया और वकीलों के तर्कों को ध्यान से सुना। तत्पश्चात वल्लभ भाई ने वकालत की परीक्षा सफलतापूर्वक उत्तीर्ण कर की।

 

कैरियर :इसके बाद सरदार पटेल ने गोधरा में अपनी वकालत शुरू की और जल्द ही उनकी वकालत चल पड़ी। उनका विवाह झबेरबा से हुआ। 1904 में पुत्री मणिबेन और 1905 में उनके पुत्र दहया भाई का जन्म हुआ। वल्लभ भाई ने अपने बड़े भाई विट्ठलभाई, जो स्वयं एक वकील थे, को कानून की उच्च शिक्षा के लिए इंग्लैंड भेजा। पटेल सिर्फ 33 साल के थे जब उनकी पत्नी का देहांत हो गया। उन्होंने पुनः विवाह की कामना नहीं की। अपने बड़े भाई के लौटने के पश्चात वल्लभ भाई इंगलैंड चले गए और एकचित्त होकर लगन के साथ पढाई की और क़ानूनी परीक्षा में प्रथम स्थान प्राप्त किया।सरदार पटेल 1913 में भारत लौटे और अहमदाबाद में अपनी वकालत शुरू की। जल्द ही वह लोकप्रिय हो गए। अपने मित्रों के आग्रह पर पटेल ने 1917 में अहमदाबाद के सैनिटेशन कमिश्नर का चुनाव लड़ा और उसमे विजयी हुए। सरदार पटेल गांधीजी के चंपारण सत्याग्रह की सफलता से काफी प्रभावित थे। 1918 में गुजरात के खेड़ा खंड में सूखा पड़ा। किसानों ने करों से राहत की मांग की लेकिन ब्रिटिश सरकार ने मना कर दिया। गांधीजी ने किसानों का मुद्दा उठाया पर वो अपना पूरा समय खेड़ा में अर्पित नहीं कर सकते थे इसलिए एक ऐसे व्यक्ति की तलाश कर रहे थे जो उनकी अनुपस्थिति में इस संघर्ष की अगुवाई कर सके। इस समय सरदार पटेल स्वेछा से आगे आये और संघर्ष का नेतृत्व किया। इस प्रकार उन्होंने अपने सफल वकालत के पेशे को छोड़ सामाजिक जीवन में प्रवेश किया।

 

राजनैतिक जीवन :वल्लभ भाई ने खेड़ा में किसानो के संघर्ष का सफलतापूर्वक नेतृत्व किया जिसके परिणामस्वरूप ब्रिटिश सरकार ने राजस्व की वसूली पर रोक लगाई और करों को वापस लिया और वर्ष 1919 में संघर्ष खत्म हुआ। खेड़ा सत्याग्रह से वल्लभ भाई पटेल राष्ट्रीय नायक के रूप में उभर कर सामने आये। वल्लभ भाई ने गांधीजी के असहयोग आंदोलन का समर्थन किया और गुजरात कांग्रेस के अध्यक्ष के रूप में अहमदाबाद में ब्रिटिश सामान के बहिस्कार के आयोजन में मदद की। उन्होंने अपने विदेशी कपड़ों का त्याग किया और खादी पहनना शुरू किया। सरदार वल्लभ भाई पटेल 1922, 1924 और 1927 में अहमदाबाद के नगर निगम के अध्यक्ष चुने गए। उनके कार्यकाल में अहमदाबाद में बिजली की आपूर्ति को बढ़ाया गया और शिक्षा में सुधार हुआ। जल निकासी और स्वछता व्यवस्था का पूरे शहर में विस्तार किया गया।वर्ष 1928 में गुजरात का बरदोली तालुका बाढ़ और अकाल से पीड़ित था। संकट की इस घड़ी में ब्रिटिश सरकार ने राजस्व करों को तीश प्रतिशत बढ़ा दिया। सरदार पटेल किसानो के समर्थन में उतरे और गवर्नर से करों को कम करने की गुहार लगाई। गवर्नर ने इस से इनकार कर दिया और सरकार ने करों को वसूलने के दिन की भी घोषणा कर दी। सरदार पटेल ने किसानो को इकठ्ठा किया और उनसे करों की एक भी पाई न चुकाने के लिए कहा। सरकार ने इस संघर्ष को दबाने की कोशिश की किन्तु अंततः उन्हें वल्लभ भाई पटेल के आगे झुकना पड़ा। बरदोली में इस संघर्ष के दौरान और बाद में मिली जीत के कारण पूरे भारत में सरदार पटेल का राजनैतिक कद और ऊँचा हो गया। पटेल अब अपने सहयोगियों और अनुयायिओं द्वारा सरदार के नाम से सम्भोदित किये जाने लगे।1930 में नमक सत्याग्रह के दौरान उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया जिससे पुरे गुजरात में आन्दोलन और तीव्र हो गया और ब्रिटिश सरकार गाँधी और पटेल को रिहा करने पर मजबूर हो गयी। इसके बाद उन्हें मुंबई में एक बार फिर गिरफ्तार किया गया। 1931 में गांधी-इरविन समझौते पर हस्ताक्षर करने के पश्चात सरदार पटेल को जेल से रिहा किया गया और कराची में 1931 सत्र के लिए उन्हें कांग्रेस का अध्यक्ष चुना गया। लंदन में गोलमेज सम्मेलन की विफलता पर गांधीजी और सरदार पटेल को जनवरी 1932 में गिरफ्तार कर लिया गया और येरवदा की सेंट्रल जेल में कैद किया गया। कारावास की इस अवधि के दौरान सरदार पटेल और महात्मा गांधी एक दूसरे के करीब आये और दोनों के बीच में स्नेह, भरोसे और स्पष्टवादिता का गहरा रिस्ता बना। अंततः जुलाई 1934 में सरदार पटेल को रिहा किया गया।अगस्त 1942 में कांग्रेस ने भारत छोड़ो आंदोलन आरम्भ किया। सरकार ने वल्लभ भाई पटेल सहित कांग्रेस के सारे विशिष्ट नेताओ को कारावास में डाल दिया। सारे नेताओं को तीन साल के बाद छोड़ दिया गया। 15 अगस्त 1947 को स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात पंडित जवाहरलाल नेहरू स्वतंत्र भारत के प्रथम प्रधानमंत्री और सरदार पटेल उप-प्रधानमंत्री बने। इसके अतिरिक्त वह गृहमंत्रालय, सूचना एवं प्रसारण और राज्यों के मंत्रालय के प्रभारी भी थे।

 

देसी राज्यों (रियासतों) का विलय :आजादी के समय भारत में कुल 565 रियासतें थीं। कुछ महाराजा और नवाब, जिनका इन रियासतों पर शासन था, जागरूक और देशभक्त थे पर उनमे से बहुत सारे दौलत और सत्ता के नशे में थे। जब अंग्रेजो ने भारत छोड़ा तब वे स्वतंत्र शासक बनने के स्वप्न देख रहे थे। उन्होंने तर्क दिया कि स्वतंत्र भारत की सरकार उन्हें बराबरी का दर्जा दे। उनमे से कुछ लोग तो संयुक्त राष्ट्र संगठन को अपना प्रतिनिधि भेजने की योजना बनाने की हद तक चले गए। पटेल ने भारत के राजाओं से देशभक्ति का आह्वान किया और उनसे कहा कि वो देश की स्वतंत्रता से जुड़ें और एक जिम्मेदार शासक के तरह बर्ताव करें जो सिर्फ अपनी प्रजा के भविष्य की चिंता करतें हैं। उन्होंने 565 रियासतों के राजाओं को यह स्पष्ट कर दिया की अलग राज्य का उनका सपना असंभव है और भारतीय गणतंत्र का हिस्सा बनने में ही उनकी भलाई है। इसके बाद उन्होंने महान बुद्धिमत्ता और राजनैतिक दूरदर्शिता के साथ छोटी रियासतों को संगठित किया। उनके इस पहल में रियासतों की जनता भी उनके साथ थी। उन्होंने हैदराबाद के निज़ाम और जूनागढ़ के नवाब को काबू में किया जो प्रारम्भ में भारत से नहीं जुड़ना चाहते थे। उन्होंने एक बिखरे हुए देश को बिना किसी रक्तपात के संगठित कर दिया। अपने इस विशाल कार्य की उपलब्धि के लिए सरदार पटेल को लौह पुरुष का ख़िताब मिला।सरदार पटेल का देहांत 15 दिसम्बर 1950 को ह्रदय की गति रुक जाने के कारण हुआ।देश के प्रति उनकी सेवाओं के लिए सरदार पटेल को 1991 में भारत रत्न से सम्मानित किया गया।

Tuesday, 26 January 2021

किसान बिल में है क्या ?

#किसान_बिल में_है क्या ?

आन्दोलनकारी पूरा कानून वापस करने की मांग क्यों कर रहे हैं? 

इस कृषि कानून में कुछ ऐसे प्रावधान हैं जिसकी वापसी यदि न हुई तो कई बड़ी हस्तियों की चोरी पकड़ ली जायेगी *इसलिये ये लोग संशोधन की बात कर ही नहीं रहे हैं* पूरा कानून वापस करने की बात कर रहे हैं 

वस्तुतः ये कानून कुछ बड़े बड़े मगरमच्छों के बरबादी की इबारत हैं और *वही मगरमच्छ परेशान हैं …*… 

ये सड़क पर घेरकर जो लोग दिख रहे हैं *ये उन मगरमच्छों के मोहरे मात्र हैं …*…

दिलीप आप्टे जी के एक आलेख से इस एंगल पर रोशनी पड़ी कि किसान बिल के नए फार्म रिफॉर्म की जड़ क्या है और ये लोग इससे क्यों चिंतित हैं? *इसे सही ढंग से समझने के लिए इस विश्लेषण को पढ़ें …*…


नई प्रणाली में *कृषि उपज के* व्यापारियों को केंद्रीय प्राधिकरण के साथ *अपने PAN सहित पंजीकृत करवाना होगा …*…


प्रथम स्तर का लेनदेन वर्तमान में (किसान और व्यापारी के बीच) *जीएसटी प्रणाली के दायरे से बाहर है …*…


धीरे-धीरे *आगे कृषि व्यापार* (पंजीकृत व्यापारियों) को जीएसटी प्रणाली में लाया जाएगा *नतीजतन* कृषि उपज की बिक्री और आय सरकार के रिकॉर्ड में मिल जाएगी *…*…


असली खेल यहाँ से शुरू होगा *किसान तो हमेशा आयकर और जीएसटी प्रणाली से मुक्त रहेंगे* लेकिन जो ट्रेडर्स इन एग्रीकल्चर प्रोडक्ट को अप-स्ट्रीम बेचते हैं उन्हें जीएसटी और इनकम टैक्स के दायरे में लाया जाएगा *…*…


इसे यहाँ समझने के लिए एक उदाहरण है अगर सुप्रियासुले और चिदंबरम को अपने अंगूर और गोभी को व्यापारियों को क्रमशः 500 करोड़ रुपये में बेचना है *तो उन्हें आयकर से छूट रहेगी* लेकिन उन्हें अपने आईटीआर में *जिस व्यापारी  को माल बेचा* उसके PAN को उद्धृत करना होगा *…*…


ट्रेडर को अप-स्ट्रीम में माल को बेचकर अपनी आय पर 500 करोड़ रुपये और आयकर पर जीएसटी का भुगतान करना होगा *…*…


कल्पना कीजिए कि यदि कोई अंगूर और कोई गोभी है ही नहीं (सिर्फ भ्रष्टाचार का पैसा है) तो  स्वाभाविक रूप से *व्यापारी सुप्रिया सुले* या *चिदंबरम से जीएसटी और आयकर वसूल करेगा …*…


इसलिए *सभी सुले*, *सभी चिदंबरम*, *सभी भ्रष्ट नेताओं को* जो कमीशन एजेंट और दलाल हैं उन्हें अपनी कृषि आय दिखाने के लिए अब एक बड़ी रकम का भुगतान इनकम टैक्स और GST के रूप में भुगतना होगा *ये रकम करोड़ों में नहीं बल्कि अरबों में है …*…


ईमानदार किसान जिनके पास वास्तव में कृषि उपज थी *वे इस दायरे से मुक्त रहेंगे …*…


यही इस मामले की जड़ है इसलिए सारे भ्रष्टाचारी बिलबिला रहे हैं यदि यह बिल रहा तो उनके *भ्रष्टाचार से कमाए खजाने में छेद हो जायेगा …*…


*पंजाब और महाराष्ट्र* में कृषिगत भ्रष्टाचार सबसे ज्यादा है *साथ ही वाड्रा के साम्रज्य का बड़ा हिस्सा हरियाणा में है तो विरोध वहीं से आ रहा है …*…


यदि कल को अंबानी अडानी इन किसानों से माल खरीदते भी हैं तो उन्हें उस खरीद पर सरकार को GST और टैक्स देना होगा जो अब तक टैक्स से बचा हुआ था *…*…


*अब आप समझ सकते हैं कि सारे विपक्षी राजनेता* आंदोलनकारियों की भीड़ इकट्ठा करने में इतना भारी धन क्यों खर्च कर रहे हैं *…*…


अगर भारत से भ्रष्टाचार का मूल खत्म करना है तो सही बिलों के पीछे छुपी *राष्ट्र निर्माण की मंशा* को समझना होगा और इनका समर्थन करना होगा *…*…


तभी यह कानून भ्रष्ट लोगों के जीवन मरण का प्रश्न बन गया है *जिसे बेचारा निर्दोष और किसान नहीं समझ पा रहा है !!!!!!!!!


यह सारी जानकारी एक वाटसाप मैसेज पर मिला जिसको हमने काफी पेस्ट मात्र कीया है

Saturday, 2 January 2021

सनातन धर्म की जानकारी










आत्मिय बंधुओं

इस पोस्ट को समय निकाल कर

एक बार जरूर पढ़ें, ऐसी जानकारी

लोगों को सरलता से नहीं ध्यान पर आती

सनातन संस्कृति की पहचान के लिए 

आगे भेजें,

ताकि लोगों को सनातन धर्म की

जानकारी हो सके

आपका आभार धन्यवाद भगवंत 


1-अष्टाध्यायी               पाणिनी

2-रामायण                    वाल्मीकि

3-महाभारत                  वेदव्यास

4-अर्थशास्त्र                  चाणक्य

5-महाभाष्य                  पतंजलि

6-सत्सहसारिका सूत्र      नागार्जुन

7-बुद्धचरित                  अश्वघोष

8-सौंदरानन्द                 अश्वघोष

9-महाविभाषाशास्त्र        वसुमित्र

10- स्वप्नवासवदत्ता        भास

11-कामसूत्र                  वात्स्यायन

12-कुमारसंभवम्           कालिदास

13-अभिज्ञानशकुंतलम्    कालिदास  

14-विक्रमोउर्वशियां        कालिदास

15-मेघदूत                    कालिदास

16-रघुवंशम्                  कालिदास

17-मालविकाग्निमित्रम्   कालिदास

18-नाट्यशास्त्र              भरतमुनि

19-देवीचंद्रगुप्तम          विशाखदत्त

20-मृच्छकटिकम्          शूद्रक

21-सूर्य सिद्धान्त           आर्यभट्ट

22-वृहतसिंता               बरामिहिर

23-पंचतंत्र।                  विष्णु शर्मा

24-कथासरित्सागर        सोमदेव

25-अभिधम्मकोश         वसुबन्धु

26-मुद्राराक्षस               विशाखदत्त

27-रावणवध।              भटिट

28-किरातार्जुनीयम्       भारवि

29-दशकुमारचरितम्     दंडी

30-हर्षचरित                वाणभट्ट

31-कादंबरी                वाणभट्ट

32-वासवदत्ता             सुबंधु

33-नागानंद                हर्षवधन

34-रत्नावली               हर्षवर्धन

35-प्रियदर्शिका            हर्षवर्धन

36-मालतीमाधव         भवभूति

37-पृथ्वीराज विजय     जयानक

38-कर्पूरमंजरी            राजशेखर

39-काव्यमीमांसा         राजशेखर

40-नवसहसांक चरित   पदम् गुप्त

41-शब्दानुशासन         राजभोज

42-वृहतकथामंजरी      क्षेमेन्द्र

43-नैषधचरितम           श्रीहर्ष

44-विक्रमांकदेवचरित   बिल्हण

45-कुमारपालचरित      हेमचन्द्र

46-गीतगोविन्द            जयदेव

47-पृथ्वीराजरासो         चंदरवरदाई

48-राजतरंगिणी           कल्हण

49-रासमाला               सोमेश्वर

50-शिशुपाल वध          माघ

51-गौडवाहो                वाकपति

52-रामचरित                सन्धयाकरनंदी

53-द्वयाश्रय काव्य         हेमचन्द्र


वेद-ज्ञान:-


प्र.1-  वेद किसे कहते है ?

उत्तर-  ईश्वरीय ज्ञान की पुस्तक को वेद कहते है।


प्र.2-  वेद-ज्ञान किसने दिया ?

उत्तर-  ईश्वर ने दिया।


प्र.3-  ईश्वर ने वेद-ज्ञान कब दिया ?

उत्तर-  ईश्वर ने सृष्टि के आरंभ में वेद-ज्ञान दिया।


प्र.4-  ईश्वर ने वेद ज्ञान क्यों दिया ?

उत्तर- मनुष्य-मात्र के कल्याण         के लिए।


प्र.5-  वेद कितने है ?

उत्तर- चार ।                                                  

1-ऋग्वेद 

2-यजुर्वेद  

3-सामवेद

4-अथर्ववेद


प्र.6-  वेदों के ब्राह्मण ।

        वेद              ब्राह्मण

1 - ऋग्वेद      -     ऐतरेय

2 - यजुर्वेद      -     शतपथ

3 - सामवेद     -    तांड्य

4 - अथर्ववेद   -   गोपथ


प्र.7-  वेदों के उपवेद कितने है।

उत्तर -  चार।

      वेद                     उपवेद

    1- ऋग्वेद       -     आयुर्वेद

    2- यजुर्वेद       -    धनुर्वेद

    3 -सामवेद      -     गंधर्ववेद

    4- अथर्ववेद    -     अर्थवेद


प्र 8-  वेदों के अंग हैं ।

उत्तर -  छः ।

1 - शिक्षा

2 - कल्प

3 - निरूक्त

4 - व्याकरण

5 - छंद

6 - ज्योतिष


प्र.9- वेदों का ज्ञान ईश्वर ने किन किन ऋषियो को दिया ?

उत्तर- चार ऋषियों को।

         वेद                ऋषि

1- ऋग्वेद         -      अग्नि

2 - यजुर्वेद       -       वायु

3 - सामवेद      -      आदित्य

4 - अथर्ववेद    -     अंगिरा


प्र.10-  वेदों का ज्ञान ईश्वर ने ऋषियों को कैसे दिया ?

उत्तर- समाधि की अवस्था में।


प्र.11-  वेदों में कैसे ज्ञान है ?

उत्तर-  सब सत्य विद्याओं का ज्ञान-विज्ञान।


प्र.12-  वेदो के विषय कौन-कौन से हैं ?

उत्तर-   चार ।

        ऋषि        विषय

1-  ऋग्वेद    -    ज्ञान

2-  यजुर्वेद    -    कर्म

3-  सामवे     -    उपासना

4-  अथर्ववेद -    विज्ञान


प्र.13-  वेदों में।


ऋग्वेद में।

1-  मंडल      -  10

2 - अष्टक     -   08

3 - सूक्त        -  1028

4 - अनुवाक  -   85 

5 - ऋचाएं     -  10589


यजुर्वेद में।

1- अध्याय    -  40

2- मंत्र           - 1975


सामवेद में।

1-  आरचिक   -  06

2 - अध्याय     -   06

3-  ऋचाएं       -  1875


अथर्ववेद में।

1- कांड      -    20

2- सूक्त      -   731

3 - मंत्र       -   5977

          

प्र.14-  वेद पढ़ने का अधिकार किसको है ?                                                                                                                                                              उत्तर-  मनुष्य-मात्र को वेद पढ़ने का अधिकार है।


प्र.15-  क्या वेदों में मूर्तिपूजा का विधान है ?

उत्तर-  बिलकुल भी नहीं।


प्र.16-  क्या वेदों में अवतारवाद का प्रमाण है ?

उत्तर-  नहीं।


प्र.17-  सबसे बड़ा वेद कौन-सा है ?

उत्तर-  ऋग्वेद।


प्र.18-  वेदों की उत्पत्ति कब हुई ?

उत्तर-  वेदो की उत्पत्ति सृष्टि के आदि से परमात्मा द्वारा हुई । अर्थात 1 अरब 96 करोड़ 8 लाख 43 हजार वर्ष पूर्व । 


प्र.19-  वेद-ज्ञान के सहायक दर्शन-शास्त्र ( उपअंग ) कितने हैं और उनके लेखकों का क्या नाम है ?

उत्तर- 

1-  न्याय दर्शन  - गौतम मुनि।

2- वैशेषिक दर्शन  - कणाद मुनि।

3- योगदर्शन  - पतंजलि मुनि।

4- मीमांसा दर्शन  - जैमिनी मुनि।

5- सांख्य दर्शन  - कपिल मुनि।

6- वेदांत दर्शन  - व्यास मुनि।


प्र.20-  शास्त्रों के विषय क्या है ?

उत्तर-  आत्मा,  परमात्मा, प्रकृति,  जगत की उत्पत्ति,  मुक्ति अर्थात सब प्रकार का भौतिक व आध्यात्मिक  ज्ञान-विज्ञान आदि।


प्र.21-  प्रामाणिक उपनिषदे कितनी है ?

उत्तर-  केवल ग्यारह।


प्र.22-  उपनिषदों के नाम बतावे ?

उत्तर-  

01-ईश ( ईशावास्य )  

02-केन  

03-कठ  

04-प्रश्न  

05-मुंडक  

06-मांडू  

07-ऐतरेय  

08-तैत्तिरीय 

09-छांदोग्य 

10-वृहदारण्यक 

11-श्वेताश्वतर ।


प्र.23-  उपनिषदों के विषय कहाँ से लिए गए है ?

उत्तर- वेदों से।

प्र.24- चार वर्ण।

उत्तर- 

1- ब्राह्मण

2- क्षत्रिय

3- वैश्य

4- शूद्र


प्र.25- चार युग।

1- सतयुग - 17,28000  वर्षों का नाम ( सतयुग ) रखा है।

2- त्रेतायुग- 12,96000  वर्षों का नाम ( त्रेतायुग ) रखा है।

3- द्वापरयुग- 8,64000  वर्षों का नाम है।

4- कलयुग- 4,32000  वर्षों का नाम है।

कलयुग के  4,976  वर्षों का भोग हो चुका है अभी तक।

4,27024 वर्षों का भोग होना है। 


पंच महायज्ञ

       1- ब्रह्मयज्ञ   

       2- देवयज्ञ

       3- पितृयज्ञ

       4- बलिवैश्वदेवयज्ञ

       5- अतिथियज्ञ

   

स्वर्ग  -  जहाँ सुख है।

नरक  -  जहाँ दुःख है।.


*#भगवान_शिव के  "35" रहस्य!!!!!!!!


भगवान शिव अर्थात पार्वती के पति शंकर जिन्हें महादेव, भोलेनाथ, आदिनाथ आदि कहा जाता है।


*🔱1. आदिनाथ शिव : -* सर्वप्रथम शिव ने ही धरती पर जीवन के प्रचार-प्रसार का प्रयास किया इसलिए उन्हें 'आदिदेव' भी कहा जाता है। 'आदि' का अर्थ प्रारंभ। आदिनाथ होने के कारण उनका एक नाम 'आदिश' भी है।


*🔱2. शिव के अस्त्र-शस्त्र : -* शिव का धनुष पिनाक, चक्र भवरेंदु और सुदर्शन, अस्त्र पाशुपतास्त्र और शस्त्र त्रिशूल है। उक्त सभी का उन्होंने ही निर्माण किया था।


*🔱3. भगवान शिव का नाग : -* शिव के गले में जो नाग लिपटा रहता है उसका नाम वासुकि है। वासुकि के बड़े भाई का नाम शेषनाग है।


*🔱4. शिव की अर्द्धांगिनी : -* शिव की पहली पत्नी सती ने ही अगले जन्म में पार्वती के रूप में जन्म लिया और वही उमा, उर्मि, काली कही गई हैं।


*🔱5. शिव के पुत्र : -* शिव के प्रमुख 6 पुत्र हैं- गणेश, कार्तिकेय, सुकेश, जलंधर, अयप्पा और भूमा। सभी के जन्म की कथा रोचक है।


*🔱6. शिव के शिष्य : -* शिव के 7 शिष्य हैं जिन्हें प्रारंभिक सप्तऋषि माना गया है। इन ऋषियों ने ही शिव के ज्ञान को संपूर्ण धरती पर प्रचारित किया जिसके चलते भिन्न-भिन्न धर्म और संस्कृतियों की उत्पत्ति हुई। शिव ने ही गुरु और शिष्य परंपरा की शुरुआत की थी। शिव के शिष्य हैं- बृहस्पति, विशालाक्ष, शुक्र, सहस्राक्ष, महेन्द्र, प्राचेतस मनु, भरद्वाज इसके अलावा 8वें गौरशिरस मुनि भी थे।


*🔱7. शिव के गण : -* शिव के गणों में भैरव, वीरभद्र, मणिभद्र, चंदिस, नंदी, श्रृंगी, भृगिरिटी, शैल, गोकर्ण, घंटाकर्ण, जय और विजय प्रमुख हैं। इसके अलावा, पिशाच, दैत्य और नाग-नागिन, पशुओं को भी शिव का गण माना जाता है। 


*🔱8. शिव पंचायत : -* भगवान सूर्य, गणपति, देवी, रुद्र और विष्णु ये शिव पंचायत कहलाते हैं।


*🔱9. शिव के द्वारपाल : -* नंदी, स्कंद, रिटी, वृषभ, भृंगी, गणेश, उमा-महेश्वर और महाकाल।


*🔱10. शिव पार्षद : -* जिस तरह जय और विजय विष्णु के पार्षद हैं उसी तरह बाण, रावण, चंड, नंदी, भृंगी आदि शिव के पार्षद हैं।


*🔱11. सभी धर्मों का केंद्र शिव : -* शिव की वेशभूषा ऐसी है कि प्रत्येक धर्म के लोग उनमें अपने प्रतीक ढूंढ सकते हैं। मुशरिक, यजीदी, साबिईन, सुबी, इब्राहीमी धर्मों में शिव के होने की छाप स्पष्ट रूप से देखी जा सकती है। शिव के शिष्यों से एक ऐसी परंपरा की शुरुआत हुई, जो आगे चलकर शैव, सिद्ध, नाथ, दिगंबर और सूफी संप्रदाय में वि‍भक्त हो गई।


*🔱12. बौद्ध साहित्य के मर्मज्ञ अंतरराष्ट्रीय : -*  ख्यातिप्राप्त विद्वान प्रोफेसर उपासक का मानना है कि शंकर ने ही बुद्ध के रूप में जन्म लिया था। उन्होंने पालि ग्रंथों में वर्णित 27 बुद्धों का उल्लेख करते हुए बताया कि इनमें बुद्ध के 3 नाम अतिप्राचीन हैं- तणंकर, शणंकर और मेघंकर।


*🔱13. देवता और असुर दोनों के प्रिय शिव : -* भगवान शिव को देवों के साथ असुर, दानव, राक्षस, पिशाच, गंधर्व, यक्ष आदि सभी पूजते हैं। वे रावण को भी वरदान देते हैं और राम को भी। उन्होंने भस्मासुर, शुक्राचार्य आदि कई असुरों को वरदान दिया था। शिव, सभी आदिवासी, वनवासी जाति, वर्ण, धर्म और समाज के सर्वोच्च देवता हैं।


*🔱14. शिव चिह्न : -* वनवासी से लेकर सभी साधारण व्‍यक्ति जिस चिह्न की पूजा कर सकें, उस पत्‍थर के ढेले, बटिया को शिव का चिह्न माना जाता है। इसके अलावा रुद्राक्ष और त्रिशूल को भी शिव का चिह्न माना गया है। कुछ लोग डमरू और अर्द्ध चन्द्र को भी शिव का चिह्न मानते हैं, हालांकि ज्यादातर लोग शिवलिंग अर्थात शिव की ज्योति का पूजन करते हैं।


*🔱15. शिव की गुफा : -* शिव ने भस्मासुर से बचने के लिए एक पहाड़ी में अपने त्रिशूल से एक गुफा बनाई और वे फिर उसी गुफा में छिप गए। वह गुफा जम्मू से 150 किलोमीटर दूर त्रिकूटा की पहाड़ियों पर है। दूसरी ओर भगवान शिव ने जहां पार्वती को अमृत ज्ञान दिया था वह गुफा 'अमरनाथ गुफा' के नाम से प्रसिद्ध है।


*🔱16. शिव के पैरों के निशान : -* श्रीपद- श्रीलंका में रतन द्वीप पहाड़ की चोटी पर स्थित श्रीपद नामक मंदिर में शिव के पैरों के निशान हैं। ये पदचिह्न 5 फुट 7 इंच लंबे और 2 फुट 6 इंच चौड़े हैं। इस स्थान को सिवानोलीपदम कहते हैं। कुछ लोग इसे आदम पीक कहते हैं।


रुद्र पद- तमिलनाडु के नागपट्टीनम जिले के थिरुवेंगडू क्षेत्र में श्रीस्वेदारण्येश्‍वर का मंदिर में शिव के पदचिह्न हैं जिसे 'रुद्र पदम' कहा जाता है। इसके अलावा थिरुवन्नामलाई में भी एक स्थान पर शिव के पदचिह्न हैं।


तेजपुर- असम के तेजपुर में ब्रह्मपुत्र नदी के पास स्थित रुद्रपद मंदिर में शिव के दाएं पैर का निशान है।


जागेश्वर- उत्तराखंड के अल्मोड़ा से 36 किलोमीटर दूर जागेश्वर मंदिर की पहाड़ी से लगभग साढ़े 4 किलोमीटर दूर जंगल में भीम के मंदिर के पास शिव के पदचिह्न हैं। पांडवों को दर्शन देने से बचने के लिए उन्होंने अपना एक पैर यहां और दूसरा कैलाश में रखा था।


रांची- झारखंड के रांची रेलवे स्टेशन से 7 किलोमीटर की दूरी पर 'रांची हिल' पर शिवजी के पैरों के निशान हैं। इस स्थान को 'पहाड़ी बाबा मंदिर' कहा जाता है।


*🔱17. शिव के अवतार : -* वीरभद्र, पिप्पलाद, नंदी, भैरव, महेश, अश्वत्थामा, शरभावतार, गृहपति, दुर्वासा, हनुमान, वृषभ, यतिनाथ, कृष्णदर्शन, अवधूत, भिक्षुवर्य, सुरेश्वर, किरात, सुनटनर्तक, ब्रह्मचारी, यक्ष, वैश्यानाथ, द्विजेश्वर, हंसरूप, द्विज, नतेश्वर आदि हुए हैं। वेदों में रुद्रों का जिक्र है। रुद्र 11 बताए जाते हैं- कपाली, पिंगल, भीम, विरुपाक्ष, विलोहित, शास्ता, अजपाद, आपिर्बुध्य, शंभू, चण्ड तथा भव।


*🔱18. शिव का विरोधाभासिक परिवार : -* शिवपुत्र कार्तिकेय का वाहन मयूर है, जबकि शिव के गले में वासुकि नाग है। स्वभाव से मयूर और नाग आपस में दुश्मन हैं। इधर गणपति का वाहन चूहा है, जबकि सांप मूषकभक्षी जीव है। पार्वती का वाहन शेर है, लेकिन शिवजी का वाहन तो नंदी बैल है। इस विरोधाभास या वैचारिक भिन्नता के बावजूद परिवार में एकता है।


*🔱19.*  ति‍ब्बत स्थित कैलाश पर्वत पर उनका निवास है। जहां पर शिव विराजमान हैं उस पर्वत के ठीक नीचे पाताल लोक है जो भगवान विष्णु का स्थान है। शिव के आसन के ऊपर वायुमंडल के पार क्रमश: स्वर्ग लोक और फिर ब्रह्माजी का स्थान है।


*🔱20.शिव भक्त : -* ब्रह्मा, विष्णु और सभी देवी-देवताओं सहित भगवान राम और कृष्ण भी शिव भक्त है। हरिवंश पुराण के अनुसार, कैलास पर्वत पर कृष्ण ने शिव को प्रसन्न करने के लिए तपस्या की थी। भगवान राम ने रामेश्वरम में शिवलिंग स्थापित कर उनकी पूजा-अर्चना की थी।


*🔱21.शिव ध्यान : -* शिव की भक्ति हेतु शिव का ध्यान-पूजन किया जाता है। शिवलिंग को बिल्वपत्र चढ़ाकर शिवलिंग के समीप मंत्र जाप या ध्यान करने से मोक्ष का मार्ग पुष्ट होता है।


*🔱22.शिव मंत्र : -* दो ही शिव के मंत्र हैं पहला- ॐ नम: शिवाय। दूसरा महामृत्युंजय मंत्र- ॐ ह्रौं जू सः। ॐ भूः भुवः स्वः। ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्‌। उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात्‌। स्वः भुवः भूः ॐ। सः जू ह्रौं ॐ ॥ है।


*🔱23.शिव व्रत और त्योहार : -* सोमवार, प्रदोष और श्रावण मास में शिव व्रत रखे जाते हैं। शिवरात्रि और महाशिवरात्रि शिव का प्रमुख पर्व त्योहार है।


*🔱24.शिव प्रचारक : -* भगवान शंकर की परंपरा को उनके शिष्यों बृहस्पति, विशालाक्ष (शिव), शुक्र, सहस्राक्ष, महेन्द्र, प्राचेतस मनु, भरद्वाज, अगस्त्य मुनि, गौरशिरस मुनि, नंदी, कार्तिकेय, भैरवनाथ आदि ने आगे बढ़ाया। इसके अलावा वीरभद्र, मणिभद्र, चंदिस, नंदी, श्रृंगी, भृगिरिटी, शैल, गोकर्ण, घंटाकर्ण, बाण, रावण, जय और विजय ने भी शैवपंथ का प्रचार किया। इस परंपरा में सबसे बड़ा नाम आदिगुरु भगवान दत्तात्रेय का आता है। दत्तात्रेय के बाद आदि शंकराचार्य, मत्स्येन्द्रनाथ और गुरु गुरुगोरखनाथ का नाम प्रमुखता से लिया जाता है।


*🔱25.शिव महिमा : -* शिव ने कालकूट नामक विष पिया था जो अमृत मंथन के दौरान निकला था। शिव ने भस्मासुर जैसे कई असुरों को वरदान दिया था। शिव ने कामदेव को भस्म कर दिया था। शिव ने गणेश और राजा दक्ष के सिर को जोड़ दिया था। ब्रह्मा द्वारा छल किए जाने पर शिव ने ब्रह्मा का पांचवां सिर काट दिया था।


*🔱26.शैव परम्परा : -* दसनामी, शाक्त, सिद्ध, दिगंबर, नाथ, लिंगायत, तमिल शैव, कालमुख शैव, कश्मीरी शैव, वीरशैव, नाग, लकुलीश, पाशुपत, कापालिक, कालदमन और महेश्वर सभी शैव परंपरा से हैं। चंद्रवंशी, सूर्यवंशी, अग्निवंशी और नागवंशी भी शिव की परंपरा से ही माने जाते हैं। भारत की असुर, रक्ष और आदिवासी जाति के आराध्य देव शिव ही हैं। शैव धर्म भारत के आदिवासियों का धर्म है।


*🔱27.शिव के प्रमुख नाम : -*  शिव के वैसे तो अनेक नाम हैं जिनमें 108 नामों का उल्लेख पुराणों में मिलता है लेकिन यहां प्रचलित नाम जानें- महेश, नीलकंठ, महादेव, महाकाल, शंकर, पशुपतिनाथ, गंगाधर, नटराज, त्रिनेत्र, भोलेनाथ, आदिदेव, आदिनाथ, त्रियंबक, त्रिलोकेश, जटाशंकर, जगदीश, प्रलयंकर, विश्वनाथ, विश्वेश्वर, हर, शिवशंभु, भूतनाथ और रुद्र।


*🔱28.अमरनाथ के अमृत वचन : -* शिव ने अपनी अर्धांगिनी पार्वती को मोक्ष हेतु अमरनाथ की गुफा में जो ज्ञान दिया उस ज्ञान की आज अनेकानेक शाखाएं हो चली हैं। वह ज्ञानयोग और तंत्र के मूल सूत्रों में शामिल है। 'विज्ञान भैरव तंत्र' एक ऐसा ग्रंथ है, जिसमें भगवान शिव द्वारा पार्वती को बताए गए 112 ध्यान सूत्रों का संकलन है।


*🔱29.शिव ग्रंथ : -* वेद और उपनिषद सहित विज्ञान भैरव तंत्र, शिव पुराण और शिव संहिता में शिव की संपूर्ण शिक्षा और दीक्षा समाई हुई है। तंत्र के अनेक ग्रंथों में उनकी शिक्षा का विस्तार हुआ है।


*🔱30.शिवलिंग : -* वायु पुराण के अनुसार प्रलयकाल में समस्त सृष्टि जिसमें लीन हो जाती है और पुन: सृष्टिकाल में जिससे प्रकट होती है, उसे लिंग कहते हैं। इस प्रकार विश्व की संपूर्ण ऊर्जा ही लिंग की प्रतीक है। वस्तुत: यह संपूर्ण सृष्टि बिंदु-नाद स्वरूप है। बिंदु शक्ति है और नाद शिव। बिंदु अर्थात ऊर्जा और नाद अर्थात ध्वनि। यही दो संपूर्ण ब्रह्मांड का आधार है। इसी कारण प्रतीक स्वरूप शिवलिंग की पूजा-अर्चना है।


*🔱31.बारह ज्योतिर्लिंग : -* सोमनाथ, मल्लिकार्जुन, महाकालेश्वर, ॐकारेश्वर, वैद्यनाथ, भीमशंकर, रामेश्वर, नागेश्वर, विश्वनाथजी, त्र्यम्बकेश्वर, केदारनाथ, घृष्णेश्वर। ज्योतिर्लिंग उत्पत्ति के संबंध में अनेकों मान्यताएं प्रचलित है। ज्योतिर्लिंग यानी 'व्यापक ब्रह्मात्मलिंग' जिसका अर्थ है 'व्यापक प्रकाश'। जो शिवलिंग के बारह खंड हैं। शिवपुराण के अनुसार ब्रह्म, माया, जीव, मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार, आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी को ज्योतिर्लिंग या ज्योति पिंड कहा गया है।


 दूसरी मान्यता अनुसार शिव पुराण के अनुसार प्राचीनकाल में आकाश से ज्‍योति पिंड पृथ्‍वी पर गिरे और उनसे थोड़ी देर के लिए प्रकाश फैल गया। इस तरह के अनेकों उल्का पिंड आकाश से धरती पर गिरे थे। भारत में गिरे अनेकों पिंडों में से प्रमुख बारह पिंड को ही ज्‍योतिर्लिंग में शामिल किया गया।


*🔱32.शिव का दर्शन : -* शिव के जीवन और दर्शन को जो लोग यथार्थ दृष्टि से देखते हैं वे सही बुद्धि वाले और यथार्थ को पकड़ने वाले शिवभक्त हैं, क्योंकि शिव का दर्शन कहता है कि यथार्थ में जियो, वर्तमान में जियो, अपनी चित्तवृत्तियों से लड़ो मत, उन्हें अजनबी बनकर देखो और कल्पना का भी यथार्थ के लिए उपयोग करो। आइंस्टीन से पूर्व शिव ने ही कहा था कि कल्पना ज्ञान से ज्यादा महत्वपूर्ण है।


*🔱33.शिव और शंकर : -* शिव का नाम शंकर के साथ जोड़ा जाता है। लोग कहते हैं- शिव, शंकर, भोलेनाथ। इस तरह अनजाने ही कई लोग शिव और शंकर को एक ही सत्ता के दो नाम बताते हैं। असल में, दोनों की प्रतिमाएं अलग-अलग आकृति की हैं। शंकर को हमेशा तपस्वी रूप में दिखाया जाता है। कई जगह तो शंकर को शिवलिंग का ध्यान करते हुए दिखाया गया है। अत: शिव और शंकर दो अलग अलग सत्ताएं है। हालांकि शंकर को भी शिवरूप माना गया है। माना जाता है कि महेष (नंदी) और महाकाल भगवान शंकर के द्वारपाल हैं। रुद्र देवता शंकर की पंचायत के सदस्य हैं।


*🔱34. देवों के देव महादेव :* देवताओं की दैत्यों से प्रतिस्पर्धा चलती रहती थी। ऐसे में जब भी देवताओं पर घोर संकट आता था तो वे सभी देवाधिदेव महादेव के पास जाते थे। दैत्यों, राक्षसों सहित देवताओं ने भी शिव को कई बार चुनौती दी, लेकिन वे सभी परास्त होकर शिव के समक्ष झुक गए इसीलिए शिव हैं देवों के देव महादेव। वे दैत्यों, दानवों और भूतों के भी प्रिय भगवान हैं। वे राम को भी वरदान देते हैं और रावण को भी।


*🔱35. शिव हर काल में : -* भगवान शिव ने हर काल में लोगों को दर्शन दिए हैं। राम के समय भी शिव थे। महाभारत काल में भी शिव थे और विक्रमादित्य के काल में भी शिव के दर्शन होने का उल्लेख मिलता है। भविष्य पुराण अनुसार राजा हर्षवर्धन को भी भगवान शिव ने दर्शन दिए थे,



महान ऋषि पिप्पलाद

पिप्पलाद उपनिषद्‍कालीन एक महान ऋषि एवं अथर्ववेद का सर्व प्रथम संकलकर्ता थे। पिप्पलाद का शब्दार्थ, 'पीपल के फल खाकर जीनेवाला' (पिप्पल...